तेजिंदर पाल सिंह बग्गा को भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली चुनाव में हरिनगर विधानसभा सीट से टिकट दिया है. देर रात पार्टी ने उनके नाम का ऐलान किया.
बीजेपी और अकाली दल के बीच इस पर विधानसभा चुनाव में गठबंधन नहीं हो पाया है. माना जा रहा है कि पार्टी द्वारा उनको टिकट देने के पीछे ये बहुत बड़ी वजह है.
दिल्ली विधानसभा चुनाव में नामांकन के लिए आज आख़िरी तारीख़ है. आठ फरवरी को दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव होना है.
तेजिंदर बग्गा के नाम के ऐलान के साथ ही सुबह से ही #Bagga4HariNagar ट्विटर पर टॉप ट्रेंड कर रहा था.
नामांकन पत्र दाखिल करने की जद्दोजहद के बीच तेजिंदर बग्गा ने बीबीसी से बातचीत की.
34 साल के तेजिंदर बग्गा के ट्विटर पर 6.4 लाख फॉलोअर हैं. जब बीजेपी दिल्ली की पहली लिस्ट में उनका नाम नहीं आया तो भी ट्विटर पर उनके पक्ष में एक मुहिम सी दिखी थी.
उन्हें ट्रोल भी किया गया. तो क्या ट्विटर पर फ़ैन फॉलोइंग और ट्रोलिंग देख कर बग्गा को ये टिकट मिला? इस सवाल पर बग्गा ज़ोर से हंसे.
फिर जल्दी से चुनाव प्रत्याशी वाली गंभीरता लाते हुए उन्होंने कहा, "एक बात बताइए, लोग आपसे जिस भाषा में बात करेंगे, आप भी तो उसी भाषा में बात करेंगे न? तो मैं भी वही करता हूं. फिर लोग मुझे ट्रोल कहते हैं. मुझे ऐसी बातों की कोई परवाह नहीं. मैं तो बस अपना काम करता हूं और करता रहूंगा."
ऐसा नहीं है कि बग्गा राजनीति में नए हैं. 2017 में पार्टी ने आधिकारिक तौर पर उन्हें दिल्ली बीजेपी का प्रवक्ता बनाया था.
लेकिन पहली बार बग्गा में चर्चा में तब आए थे जब उन्होंने आम आदमी पार्टी के पुराने साथी और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण पर हमला किया था.
प्रशांत भूषण के एक बयान पर उनको आपत्ति थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि कश्मीर में जनमत संग्रह होना चाहिए.
फ़िलहाल ये मामला कोर्ट में है लेकिन बग्गा के मुताबिक़ ये सवाल उनका पीछा ही नहीं छोड़ता.
इस मुद्दे पर उन्होंने ज़्यादा कुछ बोलने से इनकार करते हुए कहा, "जो कोई देश को तोड़ने की बात करेगा तो उसका वही हाल होगा, जो प्रशांत भूषण का हुआ."
उनके मुताबिक़ किसी पर हमला करने की उनकी इस छवि का चुनाव में कोई असर नहीं होगा. उन्होंने कहा, "कोई आपकी मां को कोई गाली देगा तो आप सुनती रहेंगी क्या? या इस बात का इंतज़ार करेंगी की इस पर कोई क़ानून बने?"
प्रशांत भूषण पर हमले के अलावा भी कई बार बग्गा सुर्खियों में रहे हैं. साल 2014 में जब कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने नरेन्द्र मोदी के लिए एक विवादस्पद बयान दिया था, तब बग्गा ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक के बाहर विरोध प्रदर्शन करने के लिए चाय की केतली लेकर चाय पिलाने पहुंचे थे.
इस तरह के आयोजनों के लिए वो अक्सर चर्चा में रहते हैं. कभी केजरीवाल के गुमशुदा होने के पोस्टर लगवाने की बात हो या फिर मोदी के प्रधानमंत्री पद के लिए रॉक परफार्मेंस की बात हो; नए तरीकों के साथ हेडलाइन में बने रहने का नायाब तरीक़ा वो खोज ही निकालते हैं.
बग्गा अपने लिए तिलकनगर सीट से टिकट मांग रहे थे लेकिन पार्टी ने उन्हें हरिनगर सीट से टिकट दिया. पार्टी के इस फ़ैसले का वो स्वागत करते हैं.
"मुझे हमेशा से देश के लिए कुछ करने का मन था. मैं चार साल की उम्र से संघ की शाखा में पिता के साथ जाता था. तब मैं दिल्ली के विकासपुरी इलाके में रहता था. 16 साल की उम्र में मैंने कांग्रेस सरकार की सीलिंग की मुहिम का विरोध किया था. 2002 में सीलिंग के विरोध में जेल भरो आंदोलन की शुरुआत भी की थी और तीन दिन तक दिल्ली की तिहाड़ जेल में भी बंद रहा था. 23 साल की उम्र में बीजेपी की नेशनल यूथ टीम में आ गया था."
बीजेपी से जुड़ाव और अपने राजनीतिक सफ़र पर रोशनी डालते हुए तेजिंदर पाल सिंह बग्गा बोलते ही चले जाते हैं.
उन्होंने कहा, "सबसे पहले बीजेपी यूथ विंग में मैं मंडल से ज़िला और फिर स्टेट लेवल टीम में आया. हरिनगर विधानसभा सीट से टिकट मिलना बीस साल से राजनीति में पैर जमाने की कोशिशों का ही नतीजा है."
बग्गा के परिवार में चुनावी राजनीति में इससे पहले किसी ने हाथ नहीं आज़माया है. ऐसा करने वाले वो पहले शख्स़ हैं. उनके पिता साल 93-94 में संघ से जुड़े थे लेकिन बाद के सालों में उतने सक्रिय नहीं रहे.
लांस प्राइज़ की किताब है 'दि मोदी इफ़ेक्ट: इनसाइड नरेन्द्र मोदी कैंपेन टू ट्रांसफॉर्म इंडिया.' साल 2015 में आई इस किताब में नरेन्द्र मोदी ने भी अपना इंटरव्यू दिया है.
इस किताब में 2014 में नरेन्द्र मोदी की जीत के कारणों को टटोलने की कोशिश की गई है.
बीबीसी से बातचीत में बग्गा ने दावा किया, "इस किताब को लिखने के लिए लेखक ने पीएमओ से दो नाम मांगे थे जिन्होंने उनके कैम्पेन में योगदान दिया. पीएमओ की तरफ से जिन दो लोगों के नाम लेखक को दिए गए उनमें से एक नाम था प्रशांत किशोर का और दूसरा नाम था मेरा. किताब में मेरे हवाले से चार-पांच पन्ने हैं."
हरिनगर विधानसभा सीट पिछली बार अकाली दल को गई थी. लेकिन तेजिंदर पाल सिंह बग्गा कहते हैं, "पिछली छह में से पांच बार इस सीट से बीजेपी के ही उम्मीदवार चुनाव लड़ा था. तो ये सीट परंपरागत तौर पर बीजेपी की ही सीट है."
पिछली दो बार से दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन रहता था, जो इस बार के चुनाव में टूट गया. क्या इस सीट पर गठबंधन टूटने का नुक़सान नहीं उठाना पड़ेगा?
इस पर बग्गा कहते हैं, "इस बार अकाली दल चुनावी मैदान में नहीं है तो मुझे नहीं लगता की कोई असर पड़ेगा. बाक़ी सिरसा जी मेरे बड़े भाई जैसे हैं, पूरा सम्मान करता हूं और उनका आशीर्वाद लेने ज़रूर जाऊंगा."
2015 में हरिनगर विधानसभा सीट से आम आदमी पार्टी के जगदीप सिंह 25 हजार से ज्यादा मतों के अंतर से जीत हासिल की थी.
बग्गा की उम्मीदवारी पर जगदीप सिंह ने बीबीसी से कहा, "ट्विटर पर फ़ॉलो करने वाले विधानसभा में जीत नहीं दिला सकते. वो हरिनगर में न तो रहते हैं और न ही उन्हें इस विधानसभा सीट का नक़्शा पता है. क्या वे बता सकते हैं कि हरिनगर में पद्म बस्ती कहां है? वहां के लोगों की दिक्कतों की तो बात ही छोड़ दीजिए."
लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी ने जगदीप को टिकट नहीं दिया है. वो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर इस बार चुनाव लड़ रहे हैं. इस चुनाव में आप ने राजकुमारी ढिल्लों को उतारा है. कांग्रेस की तरफ़ से सुरेन्द्र सेतिया मैदान में हैं.
हरिनगर विधानसभा सीट में लगभग एक लाख 65 हज़ार वोटर हैं जिनमें सिख मतदाताओं की संख्या लगभग 45 हज़ार है.
Tuesday, January 21, 2020
Monday, January 13, 2020
पुलिस ने छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी से पूछताछ की, एबीवीपी महासचिव बोलीं- यह छात्र आंदोलन नहीं नक्सल हमला था
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में इंटरनेट पर 5 महीने 4 दिन से जारी रोक और वहां लागू धारा-144 पर शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत लोगों का मौलिक अधिकार है। यानी यह जीने के हक जैसा ही जरूरी है। इंटरनेट को अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सरकार से सभी पाबंदियों की 7 दिन के अंदर समीक्षा करने और इसके आदेश को सार्वजनिक करने के निर्देश दिए। फैसला जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की बेंच ने सुनाया।
फैसले से पहले जस्टिस रमना ने फ्रांसिसी क्रांति के बाद 1859 में लिखे गए चार्ल्स डिकेन्स के मशहूर उपन्यास ‘टेल ऑफ टू सिटीज’ के हवाले से कहा- ‘वह सबसे अच्छा वक्त था, वह सबसे खराब दौर भी था। वह अक्लमंदी का दौर था, वह मूर्खता का भी जमाना था। वह आस्था का युग था, वह अविश्वास का भी दौर था। वह रोशनी का मौसम था, वह अंधकार का भी समय था। वह उम्मीदों का बसंत था, लेकिन वहां सर्द निराशा भी थी। हमारे सामने सब कुछ था, लेकिन हमारे पास कुछ भी नहीं था। हम सभी सीधे जन्नत की तरफ जा रहे थे, लेकिन असल में हम सभी कहीं और जा रहे थे। संक्षेप में कहें तो वह वक्त मौजूदा दौर जैसा था, जब शोरशराबा करने वाला प्रशासन अपनी बात माने जाने पर जोर दे रहा था, चाहे वह बात अच्छी हो या बुरी।'
इंटरनेट एक्सेस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 5 अहम बातें
इंटरनेट के जरिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मौलिक अधिकार है।
इंटरनेट के जरिए कारोबार करने के अधिकार को भी अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत संवैधानिक संरक्षण मिला हुआ है।
इंटरनेट को एक तय अवधि की जगह अपनी मर्जी से कितने भी समय के लिए बंद करना टेलीकॉम नियमों का उल्लंघन है।
स्कूल-कॉलेज और अस्पताल जैसी जरूरी सेवाओं वाले संस्थानों में इंटरनेट बहाल किया जाना चाहिए।
सरकार कश्मीर में जारी पाबंदियों की 7 दिन में समीक्षा करे और पाबंदियों की जानकारी सार्वजनिक करे ताकि आम लोग अगर चाहें तो उन पाबंदियों को कानूनी तौर पर चुनौती दे सकें।
धारा 144 पर दो अहम बातें
आजादी पर बंदिशें लगाने के लिए या अलग-अलग विचारों को दबाने के हथकंडे के तौर पर धारा 144 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। मजिस्ट्रेट को निषेधाज्ञा लागू करते समय दिमाग का इस्तेमाल और अनुपात के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।
धारा 144 को हिंसा भड़कने का अंदेशा और सार्वजनिक संपत्ति को हानि पहुंचने के खतरे जैसे इमरजेंसी हालात पर ही लागू करना चाहिए। सिर्फ असहमति इसे लगाने का आधार नहीं हो सकता। लोगों को असहमति जताने का हक है।
कश्मीर, आजादी, प्रेस और भाषण पर टिप्पणियां
कश्मीर : 'नागरिकों को सर्वोच्च सुरक्षा और सर्वोच्च आजादी मिले। कश्मीर ने हिंसा का लंबा इतिहास देखा है। हम कश्मीर में सुरक्षा के साथ-साथ मानवाधिकार और स्वतंत्रता के बीच संतुलन साधने की कोशिश करेंगे।'
प्रेस और भाषण की आजादी : 'भाषण की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। प्रेस की आजादी बहुमूल्य और अटूट अधिकार है। जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट और कम्युनिकेशन पर पाबंदी का प्रेस की आजादी पर असर पड़ा है।'
स्वतंत्रता : 'किसी भी तरह की स्वतंत्रता पर तभी रोक लगाई जा सकती है, जब कोई विकल्प न हो और सभी प्रासंगिक कारणों की ठीक से जांच कर ली जाए। यह कोर्ट की जिम्मेदारी है कि देश के सभी नागरिकों को बराबर अधिकार और सुरक्षा तय करे, लेकिन ऐसा लगता है कि स्वतंत्रता और सुरक्षा के मुद्दे पर हमेशा टकराव रहेगा।'
सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इंटरनेट के संदर्भ को अनुच्छेद 19 से जोड़ाx
इंटरनेट एक्सेस के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार मौलिक अधिकार या अनुच्छेद 19 का जिक्र किया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2017 में एक फैसले में कहा था कि इंटरनेट एक्सेस नागरिकों का हक है। वहीं, केरल हाईकोर्ट ने सितंबर 2019 में 18 साल की छात्रा की याचिका पर कहा था कि इंटरनेट एक्सेस मौलिक अधिकार है।
कश्मीर में 159 दिनों से इंटरनेट बंद और धारा 144 लागू
कश्मीर में 4 अगस्त यानी 159 दिनों से इंटरनेट बंद है और धारा 144 लागू है। यहां इंटरनेट बंद होने के मायने मोबाइल इंटरनेट और ब्रॉडबैंड, दोनों से हैं। सरकार ने हालात सामान्य होने के बाद जम्मू, लेह-लद्दाख और करगिल से धारा 144 हटा ली थी। जम्मू में भी ब्रॉडबैंड इंटरनेट चालू हो चुका है, लेकिन मोबाइल इंटरनेट बंद है।
फैसले से पहले जस्टिस रमना ने फ्रांसिसी क्रांति के बाद 1859 में लिखे गए चार्ल्स डिकेन्स के मशहूर उपन्यास ‘टेल ऑफ टू सिटीज’ के हवाले से कहा- ‘वह सबसे अच्छा वक्त था, वह सबसे खराब दौर भी था। वह अक्लमंदी का दौर था, वह मूर्खता का भी जमाना था। वह आस्था का युग था, वह अविश्वास का भी दौर था। वह रोशनी का मौसम था, वह अंधकार का भी समय था। वह उम्मीदों का बसंत था, लेकिन वहां सर्द निराशा भी थी। हमारे सामने सब कुछ था, लेकिन हमारे पास कुछ भी नहीं था। हम सभी सीधे जन्नत की तरफ जा रहे थे, लेकिन असल में हम सभी कहीं और जा रहे थे। संक्षेप में कहें तो वह वक्त मौजूदा दौर जैसा था, जब शोरशराबा करने वाला प्रशासन अपनी बात माने जाने पर जोर दे रहा था, चाहे वह बात अच्छी हो या बुरी।'
इंटरनेट एक्सेस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 5 अहम बातें
इंटरनेट के जरिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मौलिक अधिकार है।
इंटरनेट के जरिए कारोबार करने के अधिकार को भी अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत संवैधानिक संरक्षण मिला हुआ है।
इंटरनेट को एक तय अवधि की जगह अपनी मर्जी से कितने भी समय के लिए बंद करना टेलीकॉम नियमों का उल्लंघन है।
स्कूल-कॉलेज और अस्पताल जैसी जरूरी सेवाओं वाले संस्थानों में इंटरनेट बहाल किया जाना चाहिए।
सरकार कश्मीर में जारी पाबंदियों की 7 दिन में समीक्षा करे और पाबंदियों की जानकारी सार्वजनिक करे ताकि आम लोग अगर चाहें तो उन पाबंदियों को कानूनी तौर पर चुनौती दे सकें।
धारा 144 पर दो अहम बातें
आजादी पर बंदिशें लगाने के लिए या अलग-अलग विचारों को दबाने के हथकंडे के तौर पर धारा 144 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। मजिस्ट्रेट को निषेधाज्ञा लागू करते समय दिमाग का इस्तेमाल और अनुपात के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।
धारा 144 को हिंसा भड़कने का अंदेशा और सार्वजनिक संपत्ति को हानि पहुंचने के खतरे जैसे इमरजेंसी हालात पर ही लागू करना चाहिए। सिर्फ असहमति इसे लगाने का आधार नहीं हो सकता। लोगों को असहमति जताने का हक है।
कश्मीर, आजादी, प्रेस और भाषण पर टिप्पणियां
कश्मीर : 'नागरिकों को सर्वोच्च सुरक्षा और सर्वोच्च आजादी मिले। कश्मीर ने हिंसा का लंबा इतिहास देखा है। हम कश्मीर में सुरक्षा के साथ-साथ मानवाधिकार और स्वतंत्रता के बीच संतुलन साधने की कोशिश करेंगे।'
प्रेस और भाषण की आजादी : 'भाषण की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। प्रेस की आजादी बहुमूल्य और अटूट अधिकार है। जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट और कम्युनिकेशन पर पाबंदी का प्रेस की आजादी पर असर पड़ा है।'
स्वतंत्रता : 'किसी भी तरह की स्वतंत्रता पर तभी रोक लगाई जा सकती है, जब कोई विकल्प न हो और सभी प्रासंगिक कारणों की ठीक से जांच कर ली जाए। यह कोर्ट की जिम्मेदारी है कि देश के सभी नागरिकों को बराबर अधिकार और सुरक्षा तय करे, लेकिन ऐसा लगता है कि स्वतंत्रता और सुरक्षा के मुद्दे पर हमेशा टकराव रहेगा।'
सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इंटरनेट के संदर्भ को अनुच्छेद 19 से जोड़ाx
इंटरनेट एक्सेस के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार मौलिक अधिकार या अनुच्छेद 19 का जिक्र किया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2017 में एक फैसले में कहा था कि इंटरनेट एक्सेस नागरिकों का हक है। वहीं, केरल हाईकोर्ट ने सितंबर 2019 में 18 साल की छात्रा की याचिका पर कहा था कि इंटरनेट एक्सेस मौलिक अधिकार है।
कश्मीर में 159 दिनों से इंटरनेट बंद और धारा 144 लागू
कश्मीर में 4 अगस्त यानी 159 दिनों से इंटरनेट बंद है और धारा 144 लागू है। यहां इंटरनेट बंद होने के मायने मोबाइल इंटरनेट और ब्रॉडबैंड, दोनों से हैं। सरकार ने हालात सामान्य होने के बाद जम्मू, लेह-लद्दाख और करगिल से धारा 144 हटा ली थी। जम्मू में भी ब्रॉडबैंड इंटरनेट चालू हो चुका है, लेकिन मोबाइल इंटरनेट बंद है।
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